क्या ये ही जिन्दगी है ?


जीवन के *23* साल हवा की तरह उड़ गए । फिर शुरू हुई *नोकरी* की खोज । ये नहीं वो, दूर नहीं पास । ऐसा करते करते *2 .. 3* नौकरियाँ छोड़ने एक तय हुई। थोड़ी स्थिरता की शुरुआत हुई।

फिर हाथ आई पहली तनख्वाह । वह *बैंक* में जमा हई और शुरू हुआ अकाउंट में जमा होने वाले *शून्यों* का अंतहीन खेल। *2- 3* वर्ष और निकल गए। बैंक में थोड़े और *शून्य* बढ़ गए। उम्र *27* हो गयी।

और फिर *विवाह* हो गया। जीवन की *राम कहानी* शुरू हो गयी। शुरू के *2 ..  4* साल नर्म , गुलाबी, रसीले , सुनहरे गुजरे। हाथों में हाथ डालकर घूमना फिरना, रंग बिरंगे सपने। *पर ये दिन जल्दी ही उड़ गए*।

और फिर *बच्चे* के आने ही आहट हुई। वर्ष भर में *पालना* झूलने लगा। अब दोनों का सारा ध्यान बच्चे पर केन्द्रित हो गया। उठना - बैठना, खाना - पीना, लाड़ - दुलार ।

समय कैसे फटाफट निकल गया, पता ही नहीं चला।

*इस बीच कब मेरा हाथ उसके हाथ से निकल गया, बाते- करना घूमना - फिरना कब बंद हो गया दोनों को पता ही न चला*।

बच्चे* बड़े होते गये । वो *बच्चों* में व्यस्त हो गयी, मैं अपने *काम* में । घर और गाड़ी की *क़िस्त*, बच्चों की जिम्मेदारी, शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में *शुन्य* बढ़ाने की चिंता। उसने भी अपने आप को घर के काम में पूरी तरह झोंक दिया और मैंने भी नौकरी में.... 

इतने में 37* का हो गया। घर, गाडी, बैंक में *शुन्य*, परिवार सब है फिर भी कुछ कमी है ? पर वो है क्या समझ नहीं आया। उसकी चिड़  चिड़  बढती गयी, मैं उदासीन होने लगा।

इस बीच दिन बीतते गए। समय गुजरता गया। बच्चे बड़े होते गये। उनका खुद का संसार तैयार होता गया। कब *10वीं*   *anniversary*आई और चली गयी पता ही नहीं चला। तब तक हम दोनों ही *40-42* के हो गए। बैंक में *शुन्य* बढ़ता ही गया।

एक नितांत एकांत क्षण में मुझे वो *गुजरे* दिन याद आये और मौका देख कर उस से कहा " अरे जरा यहाँ आओ, पास बैठो। चलो कहीं घूम कर आते हैं।"

उसने अजीब नज़रों से मुझे देखा और कहा " *तुम्हे कुछ सूझता भी है ? यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है तुम्हे* *घूमने की सूझ रही है*।" कमर में पल्लू खोंस वो निकल गयी।

तो फिर आया *पैंतालिसवा* साल, आँखों पर चश्मा लग गया, बाल काला रंग छोड़ने लगे, दिमाग में कुछ उलझने शुरू हो गयी।

बच्चे उधर कॉलेज में थे, इधर बैंक में *शुन्य* बढ़ रहे थे। देखते ही देखते उनका *कॉलेज* ख़त्म। वह अपने पैरो पे खड़े हो गये। उनके पंख फूटे और *उड़ गये अपनी अपनी नौकरियों पर*।

घर में उसके *बालों का काला* रंग भी उड़ने लगा। कभी कभी मेरा दिमाग भी साथ छोड़ने लगा। उसे *चश्मा* भी लग गया। मैं खुद *बूढ़ा* हो गया। वो भी *उमरदराज* लगने लगी।

दोनों *55* से *60* की और बढ़ने लगे। अब हमें बैंक के *शून्यों* की कोई खबर नहीं और परवाह भी नहीं। हम दोनों के बाहर आने जाने के कार्यक्रम बंद होने लगे।

अब तो *गोली दवाइयों* के दिन और समय निश्चित होने लगे। *बच्चे* बड़े होंगे तब हम *साथ* रहेंगे सोच कर लिया गया घर अब बोझ लगने लगा। *बच्चे* कब *वापिस* आयेंगे यही सोचते सोचते बाकी के दिन गुजरने लगे।

एक दिन यूँ ही सोफे पे बैठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था, वो दिया बाती कर रही थी। तभी *फोन* की घंटी बजी। लपक के *फोन* उठाया। *दूसरी तरफ बेटा था* उसने कहा कि आपने इतने छोटे शहर में घर बनाया है, यहां ना तो उसके लिए कुछ करने को है और ना ही बहू और नाती पोते वहां रहने को तैयार हैं इसलिए अब वो *परदेश* में ही रहेगा।

उसने ये भी कहा कि पिताजी आपके बैंक के *शून्यों* को किसी *वृद्धाश्रम* में दे देना। और *मन करे तो आप और मां भी वही रह लेना*। कुछ और औपचारिक बाते कह कर बेटे ने फोन रख दिया।

मैं पुन: सोफे पर आकर बैठ गया। उसकी भी पूजा ख़त्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी *"चलो आज फिर हाथो में हाथ लेकर बात करते हैं*" *वो तुरंत बोली " अभी आई"।*

मुझे विश्वास नहीं हुआ। *चेहरा ख़ुशी से चमक उठा*। आँखें भर आई। आँखों से आंसू गिरने लगे और गाल भीग गए । अचानक आँखों की *चमक फीकी* पड़ गयी और मैं *निस्तेज* हो गया। अंदर की खुशी मानो मर गयी, हमेशा के लिए !!

उसने शेष पूजा की और मेरे पास आकर बैठ गयी " *बोलो क्या बोल रहे थे*?"

लेकिन मैने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छू कर देखा। शरीर बिलकुल *ठंडा* पड गया था। मैं उसकी और एकटक देख रहा था।

क्षण भर को वो शून्य हो गयी।

" *क्या करू*? "

उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन *एक दो* मिनट में ही वो चेतन्य हो गयी। धीरे से उठी पूजा घर में गयी। एक अगरबत्ती की। *ईश्वर को प्रणाम किया*। और फिर से आके सोफे पे बैठ गयी।

मेरा *ठंडा हाथ* अपने हाथो में लिया और बोली

" *चलो कहाँ घुमने चलना है तुम्हे* ? *क्या बातें करनी हैं तुम्हे*?" *बोलो* !!

ऐसा कहते हुए उसकी आँखे भर आई !!......

वो एकटक मुझे देखती रही। *आँखों से अश्रु धारा बह निकली*। मेरा सर उसके कंधो पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था।

*क्या ये ही जिन्दगी है ? ?*

सब अपना नसीब साथ लेके आते हैं इसलिए कुछ समय अपने लिए भी निकालो । जीवन अपना है तो जीने के तरीके भी अपने रखो। शुरुआत आज से करो। क्यूंकि कल कभी नहीं आएगा।


सभी मित्रों को समर्पित ये मार्मिक सच ,मित्रो अश्रु जरूर बहने देना रोकना नहीं, बोझ कुछ कम हो जायेगा।


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